करेले की खेती कैसे करें? पूरी जानकारी और कमाई का तरीका | Bitter Melon (Bitter Gourd) Farming Guide 2026
भारतीय बाजार में करेला (Bitter Gourd) एक ऐसी सब्जी है जिसकी मांग साल के 12 महीने बनी रहती है। चाहे डायबिटीज के मरीज हों या स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग, हर कोई करेला खाना पसंद करता है।
अगर आप पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करना चाहते हैं, तो मचान विधि (Trellis Method) से करेले की खेती आपके लिए 'कैश मशीन' साबित हो सकती है। इस विधि से न केवल उत्पादन दोगुना होता है, बल्कि फलों की गुणवत्ता भी शानदार रहती है, जिससे मंडी में सबसे अच्छा भाव मिलता है।
आज के इस विस्तृत महा-लेख (Mega Guide) में हम आपको करेले की खेती की A to Z जानकारी देंगे। साथ ही जानेंगे एक ऐसे किसान की कहानी, जिन्होंने करेला उगाकर लाखों कमाए।
राजस्थान के जयपुर जिले के एक छोटे से गांव के किसान श्री रामनिवास चौधरी पहले गेहूं और बाजरे की खेती करते थे, जिसमें लागत निकालना भी मुश्किल होता था। उन्होंने कृषि विभाग की सलाह पर अपनी 2 एकड़ जमीन में सब्जी उगाने का फैसला किया।
रामनिवास जी ने बांस और तार का मचान बनाया और उस पर हाइब्रिड करेले की बेलें चढ़ाईं। उन्होंने 'मल्चिंग पेपर' का भी इस्तेमाल किया, जिससे खरपतवार नहीं उगे और पानी की बचत हुई।
नतीजा: उनकी करेले की फसल इतनी शानदार हुई कि मंडी में व्यापारी खेत से ही माल उठाने आ गए। 6 महीने के सीजन में उन्होंने सारा खर्चा काटकर 4 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा कमाया। आज वे अपने गांव के 'करेला किंग' कहे जाते हैं।
1. करेले की खेती में मचान विधि के फायदे | Trellis Method Benefits
करेले की खेती में मचान विधि (Trellis Method) एक आधुनिक और वैज्ञानिक तकनीक है, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ फसल की गुणवत्ता भी सुधारती है। इस विधि में पौधों को जमीन पर फैलने देने के बजाय ऊपर जाल (नेट) या तार के सहारे बढ़ाया जाता है, जिससे पौधों को पर्याप्त हवा और धूप मिलती है।
- अधिक उत्पादन: पौधों को पूरी धूप और हवा मिलने से फल ज्यादा और बड़े बनते हैं।
- बेहतर गुणवत्ता: फल जमीन से ऊपर रहने के कारण साफ, सीधे और बाजार में ज्यादा कीमत वाले होते हैं।
- रोग और कीट कम: जमीन के संपर्क में न आने से फफूंदी और कीटों का प्रकोप कम होता है।
- तुड़ाई आसान: मचान पर लगे फलों को तोड़ना आसान होता है, जिससे समय और मजदूरी की बचत होती है।
- खरपतवार नियंत्रण: पौधे ऊपर बढ़ते हैं, जिससे नीचे की जमीन में खरपतवार कम उगते हैं।
इस विधि का उपयोग करके किसान न केवल अपनी उपज बढ़ा सकते हैं बल्कि बाजार में बेहतर दाम भी प्राप्त कर सकते हैं, जिससे कुल मुनाफा बढ़ता है।
2. करेले की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी | Climate & Soil Requirements
करेला (Bitter Gourd / Bitter Melon) एक गर्म जलवायु (Warm Season) की फसल है, जो सही तापमान और उपयुक्त मिट्टी में उगाने पर उच्च उत्पादन देती है। बेहतर परिणाम के लिए जलवायु और मिट्टी का सही चयन बहुत महत्वपूर्ण है।
(A) जलवायु (Climate)
- तापमान: 25°C से 32°C सबसे उपयुक्त माना जाता है।
- न्यूनतम तापमान: 18°C से नीचे वृद्धि धीमी हो जाती है।
- अधिक तापमान: 40°C से ऊपर फूल झड़ने लगते हैं।
- धूप: भरपूर धूप जरूरी है, कम धूप से उत्पादन घटता है।
- नमी: मध्यम नमी फसल के लिए अच्छी रहती है।
(B) मिट्टी (Soil)
- मिट्टी का प्रकार: दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे अच्छी होती है।
- pH स्तर: 6.0 से 7.5 आदर्श माना जाता है।
- जल निकासी: खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए, वरना जड़ सड़ सकती है।
- जैविक पदार्थ: अधिक जैविक खाद वाली मिट्टी बेहतर उत्पादन देती है।
यदि सही जलवायु और मिट्टी का चयन किया जाए, तो करेले की खेती में उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा सकती है।
3. करेले की उन्नत किस्में | Top Varieties of Bitter Gourd (Bitter Melon)
करेले की खेती में सही किस्म (Variety) का चयन उत्पादन और मुनाफे दोनों को सीधे प्रभावित करता है। उन्नत किस्मों के बीज लगाने से फसल जल्दी तैयार होती है, रोग कम लगते हैं और बाजार में अच्छी कीमत मिलती है। इसलिए क्षेत्र, मौसम और बाजार की मांग के अनुसार सही किस्म चुनना बेहद जरूरी है।
(A) प्रमुख उन्नत किस्में (Top Recommended Varieties)
- पूसा दो मौसमी (Pusa Do Mausami): यह किस्म साल में दो बार उगाई जा सकती है और जल्दी तैयार होती है।
- पूसा विशेष (Pusa Vishesh): अधिक उत्पादन देने वाली किस्म, फल गहरे हरे और आकर्षक होते हैं।
- अर्का हरित (Arka Harit): रोग प्रतिरोधी किस्म, दक्षिण भारत और गर्म क्षेत्रों के लिए उपयुक्त।
- प्रिया (Priya Hybrid): Hybrid किस्म, अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता के लिए जानी जाती है।
- CO 1 / CO 2: दक्षिण भारत में लोकप्रिय, गर्म जलवायु में अच्छा प्रदर्शन करती है।
(B) Hybrid vs Desi किस्में (Which is Better?)
- Hybrid किस्में: अधिक उत्पादन, बेहतर गुणवत्ता और बाजार में ज्यादा कीमत देती हैं।
- देसी किस्में: कम लागत में उगाई जा सकती हैं, लेकिन उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है।
(C) किस्म चयन करते समय ध्यान रखने योग्य बातें
- अपने क्षेत्र की जलवायु के अनुसार किस्म चुनें
- बाजार में मांग वाली किस्म को प्राथमिकता दें
- हमेशा प्रमाणित (Certified) बीज ही खरीदें
सही किस्म का चयन करके किसान अपनी उपज को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं और बाजार में बेहतर दाम प्राप्त कर सकते हैं।
4. बुवाई का सही समय और तरीका | Sowing Method of Bitter Gourd (Bitter Melon)
करेले की खेती में सही समय पर बुवाई और वैज्ञानिक तरीके से रोपण करने से उत्पादन में काफी वृद्धि होती है। यदि बुवाई गलत समय पर की जाए तो अंकुरण कमजोर होता है और फसल पर रोगों का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए मौसम और क्षेत्र के अनुसार सही समय और विधि का पालन करना बेहद जरूरी है।
(A) बुवाई का सही समय (Best Sowing Time)
- गर्मी की फसल: जनवरी से मार्च (उत्तर भारत के लिए)
- मानसून फसल: जून से जुलाई
- सर्दी (हल्के क्षेत्रों में): सितंबर से अक्टूबर
क्षेत्र के अनुसार समय में थोड़ा बदलाव हो सकता है, लेकिन तापमान 25°C–32°C के बीच होना चाहिए।
(B) बीज उपचार (Seed Treatment)
- बुवाई से पहले बीज को 12–24 घंटे पानी में भिगोएं
- फफूंद से बचाव के लिए कार्बेन्डाजिम या ट्राइकोडर्मा से उपचार करें
- इससे अंकुरण तेज और स्वस्थ पौधे मिलते हैं
(C) बुवाई का तरीका (Sowing Method)
- गड्ढा विधि: 2x2 फीट गड्ढे बनाकर 2–3 बीज डालें
- लाइन विधि: कतार से कतार दूरी 5–6 फीट रखें
- पौधे से पौधे की दूरी: 2–3 फीट
- अंकुरण के बाद एक स्वस्थ पौधा रखें, बाकी हटा दें
(D) आधुनिक तकनीक (Advanced Method)
- मल्चिंग (Mulching): प्लास्टिक मल्च से नमी बनी रहती है और खरपतवार कम होते हैं
- ड्रिप सिंचाई: पानी की बचत और बेहतर वृद्धि
- मचान विधि: उत्पादन और गुणवत्ता बढ़ाने के लिए जरूरी
सही समय और वैज्ञानिक विधि से बुवाई करने पर फसल की शुरुआत ही मजबूत होती है, जिससे आगे चलकर उत्पादन और मुनाफा दोनों में वृद्धि होती है।
5. मचान बनाना और 3G कटिंग | Trellis Structure & 3G Cutting in Bitter Gourd Farming
करेले की खेती में मचान (Trellis Structure) और 3G कटिंग तकनीक का उपयोग करने से उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में बड़ा सुधार होता है। यह आधुनिक तकनीक पौधों को बेहतर सहारा देती है और शाखाओं की सही दिशा में वृद्धि सुनिश्चित करती है, जिससे फल ज्यादा और बेहतर गुणवत्ता के मिलते हैं।
(A) मचान (Trellis) बनाने की विधि
- ऊंचाई: 6–7 फीट ऊंचा मचान बनाएं
- सामग्री: बांस, GI तार या प्लास्टिक रस्सी का उपयोग करें
- जाल (नेट): ऊपर जाल या तार का जाल बनाएं ताकि बेलें आसानी से फैल सकें
- दूरी: पौधों के अनुसार मजबूत संरचना बनाएं ताकि वजन सह सके
मचान बनाने से पौधे जमीन से ऊपर रहते हैं, जिससे हवा और धूप का सही संचार होता है और फसल स्वस्थ रहती है।
(B) 3G कटिंग क्या है? (What is 3G Cutting?)
3G कटिंग एक उन्नत प्रूनिंग तकनीक है, जिसमें पौधे की अनावश्यक शाखाओं को काटकर मुख्य शाखाओं को बढ़ावा दिया जाता है। इससे पौधे की ऊर्जा सही दिशा में लगती है और अधिक फल लगते हैं।
- पहली कटिंग: पौधे की शुरुआती कमजोर शाखाएं हटाएं
- दूसरी कटिंग: साइड शाखाओं को नियंत्रित करें
- तीसरी कटिंग: मुख्य शाखाओं को बढ़ने दें और अतिरिक्त शाखाएं हटा दें
(C) मचान + 3G कटिंग के फायदे
- उत्पादन में 30%–40% तक वृद्धि
- फल सीधे, साफ और आकर्षक बनते हैं
- रोग और कीट का प्रकोप कम होता है
- तुड़ाई आसान और श्रम लागत कम होती है
- बाजार में बेहतर कीमत मिलती है
यदि किसान मचान और 3G कटिंग तकनीक का सही तरीके से उपयोग करें, तो वे कम लागत में अधिक उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और अपनी आय को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
6. खाद और सिंचाई प्रबंधन | Fertilizer & Irrigation Management in Bitter Gourd Farming
करेले की खेती में अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता के लिए संतुलित खाद प्रबंधन और सही सिंचाई अत्यंत आवश्यक है। यदि पौधों को समय पर पोषक तत्व और पर्याप्त पानी नहीं मिलता, तो उत्पादन और फल की गुणवत्ता दोनों प्रभावित होती हैं।
(A) खाद प्रबंधन (Fertilizer Management)
- गोबर की खाद: 8–10 टन प्रति एकड़ (खेत तैयारी के समय)
- नाइट्रोजन (N): 40–50 किलोग्राम प्रति एकड़
- फॉस्फोरस (P): 20–25 किलोग्राम प्रति एकड़
- पोटाश (K): 20–25 किलोग्राम प्रति एकड़
नाइट्रोजन को 2–3 बार में टॉप ड्रेसिंग के रूप में देना चाहिए, जिससे पौधों की वृद्धि निरंतर बनी रहती है।
(B) जैविक खाद (Organic Inputs)
- वर्मी कम्पोस्ट: 2–3 टन प्रति एकड़
- नीम खली: 100–150 किलोग्राम प्रति एकड़
- जीवामृत / घोल: पौधों की वृद्धि बढ़ाने के लिए उपयोगी
(C) सिंचाई प्रबंधन (Irrigation Management)
- गर्मी में: हर 3–4 दिन में सिंचाई करें
- सर्दी में: 7–10 दिन के अंतराल पर पानी दें
- फूल और फल बनने के समय: नियमित नमी बनाए रखें
- जलभराव से बचाव: खेत में पानी जमा नहीं होना चाहिए
(D) आधुनिक सिंचाई तकनीक (Advanced Method)
- ड्रिप सिंचाई: पानी की 40% तक बचत और बेहतर पोषण वितरण
- फर्टिगेशन: ड्रिप के साथ घुलनशील उर्वरक देने से तेजी से वृद्धि
- मल्चिंग: नमी बनाए रखने और खरपतवार कम करने में मदद
यदि किसान संतुलित खाद और सही सिंचाई तकनीक अपनाते हैं, तो करेले की फसल में उच्च उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता के साथ अधिक मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है।
7. रोग और कीट नियंत्रण | Disease & Pest Management in Bitter Gourd (Bitter Melon)
करेले की खेती में रोग और कीटों का समय पर नियंत्रण करना बेहद जरूरी है, क्योंकि इनका प्रभाव सीधे उत्पादन और गुणवत्ता पर पड़ता है। यदि शुरुआती अवस्था में ही नियंत्रण कर लिया जाए, तो फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है।
(A) प्रमुख कीट (Common Pests)
- फल मक्खी (Fruit Fly): यह सबसे खतरनाक कीट है, जो फलों में अंडे देकर उन्हें सड़ा देती है।
- एफिड (Aphids): पत्तियों का रस चूसकर पौधों को कमजोर करते हैं।
- थ्रिप्स (Thrips): पत्तियों को नुकसान पहुंचाकर वृद्धि रोकते हैं।
(B) प्रमुख रोग (Common Diseases)
- पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew): पत्तियों पर सफेद पाउडर जैसा दिखता है।
- डाउनy मिल्ड्यू: पत्तियों पर पीले धब्बे और नीचे फफूंदी बनती है।
- वायरस रोग: पत्तियां मुड़ जाती हैं और वृद्धि रुक जाती है।
(C) नियंत्रण के उपाय (Control Measures)
- जैविक उपाय: नीम तेल (Neem Oil) का 3–5 ml प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें
- पीला स्टिकी ट्रैप: कीटों को आकर्षित कर नियंत्रण में मदद करता है
- साफ-सफाई: संक्रमित पत्तियों और फलों को तुरंत हटाएं
- फसल चक्र: एक ही खेत में बार-बार एक ही फसल न लगाएं
(D) रासायनिक नियंत्रण (Chemical Control)
- इमिडाक्लोप्रिड / स्पिनोसैड का उपयोग (कीट नियंत्रण के लिए)
- सल्फर या कार्बेन्डाजिम का उपयोग (फफूंद नियंत्रण के लिए)
- दवा का उपयोग हमेशा कृषि विशेषज्ञ की सलाह से करें
यदि किसान नियमित निगरानी और सही नियंत्रण उपाय अपनाते हैं, तो वे फसल को रोग और कीटों से बचाकर अधिक उत्पादन और बेहतर गुणवत्ता प्राप्त कर सकते हैं।
8. लागत और मुनाफे का गणित | Cost & Profit Analysis of Bitter Gourd (Bitter Melon) Farming
करेले की खेती कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें और सही बाजार में बिक्री करें, तो वे प्रति एकड़ अच्छा लाभ कमा सकते हैं। यहां हम 1 एकड़ करेले की खेती का अनुमानित खर्च और कमाई का पूरा विश्लेषण समझते हैं।
(A) अनुमानित लागत (Estimated Cost per Acre)
| विवरण | खर्च (₹ में) |
|---|---|
| बीज (Hybrid) | ₹3,000 – ₹5,000 |
| खेत तैयारी और जुताई | ₹5,000 – ₹7,000 |
| खाद और उर्वरक | ₹6,000 – ₹10,000 |
| मचान (Trellis) निर्माण | ₹10,000 – ₹15,000 |
| सिंचाई और मजदूरी | ₹5,000 – ₹8,000 |
| कुल लागत | ₹30,000 – ₹45,000 (लगभग) |
(B) उत्पादन और आय (Yield & Income)
- उत्पादन: 80–120 क्विंटल प्रति एकड़
- बाजार भाव: ₹20 – ₹40 प्रति किलोग्राम (मौसम के अनुसार)
- कुल आय: ₹1,60,000 – ₹4,80,000 प्रति एकड़
(C) शुद्ध मुनाफा (Net Profit)
- औसत शुद्ध मुनाफा: ₹1.5 लाख – ₹3 लाख प्रति एकड़
(D) मुनाफा बढ़ाने के तरीके (Profit Boost Tips)
- Hybrid बीज और मचान विधि अपनाएं
- ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग का उपयोग करें
- सीधे मंडी या थोक व्यापारी से संपर्क करें
- ऑफ-सीजन खेती करने का प्रयास करें
करेले की खेती सही योजना और तकनीक के साथ की जाए, तो यह किसानों के लिए एक स्थायी और लाभदायक व्यवसाय बन सकती है।
9. करेले की मार्केटिंग और बिक्री रणनीति | Marketing & Selling Strategy of Bitter Gourd (Bitter Melon)
करेले की खेती में अधिक मुनाफा केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि सही समय और सही जगह पर बिक्री पर भी निर्भर करता है। यदि किसान अपनी फसल को सही बाजार में और सही तरीके से बेचते हैं, तो वे अपने लाभ को 2 गुना तक बढ़ा सकते हैं।
(A) बेचने के प्रमुख तरीके (Selling Options)
- स्थानीय मंडी (Local Market): सबसे आसान तरीका, लेकिन कीमत कम मिल सकती है
- थोक व्यापारी (Wholesaler): बड़ी मात्रा में बेचने के लिए अच्छा विकल्प
- डायरेक्ट सेल (Direct Selling): होटल, रेस्टोरेंट और सब्जी दुकानदारों को सीधे बेचकर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है
- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग: कंपनियों के साथ समझौता करके निश्चित कीमत पर बिक्री
(B) सही समय पर बिक्री (Best Time to Sell)
- ऑफ-सीजन में कीमत 2–3 गुना तक बढ़ सकती है
- सुबह के समय मंडी में ताजा माल ले जाएं
- छोटे-छोटे बैच में नियमित बिक्री करें
(C) पैकिंग और ग्रेडिंग (Grading & Packaging)
- फल को आकार और गुणवत्ता के अनुसार अलग करें
- ताजा और साफ फल ही बाजार में भेजें
- प्लास्टिक क्रेट या बास्केट का उपयोग करें
(D) मुनाफा बढ़ाने के स्मार्ट तरीके (Profit Boost Tips)
- स्थानीय दुकानदारों और होटलों से सीधा संपर्क करें
- सोशल मीडिया (WhatsApp / Facebook) से ग्राहक बनाएं
- पास के शहरों की मंडियों में भी बिक्री करें
- ऑर्गेनिक करेले की खेती करके प्रीमियम कीमत प्राप्त करें
यदि किसान सही मार्केटिंग रणनीति अपनाते हैं, तो वे अपनी फसल का अधिकतम लाभ उठा सकते हैं और करेले की खेती को एक सफल व्यवसाय बना सकते हैं।
निष्कर्ष | Conclusion
करेले की खेती (Bitter Gourd / Bitter Melon Farming) एक ऐसी फसल है जो कम लागत में अधिक मुनाफा देने की क्षमता रखती है। यदि किसान सही किस्म का चयन करें, उचित समय पर बुवाई करें और आधुनिक तकनीकों जैसे मचान विधि, ड्रिप सिंचाई और 3G कटिंग अपनाएं, तो वे अपनी उपज और आय दोनों को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
आज के समय में जहां खेती में जोखिम बढ़ रहा है, वहीं करेले जैसी सब्जी फसलें किसानों के लिए एक स्थायी और लाभदायक विकल्प बनकर उभर रही हैं। सही मार्केटिंग और समय पर बिक्री के साथ यह खेती एक सफल व्यवसाय में बदल सकती है।
यदि आप भी कम लागत में अधिक मुनाफा कमाना चाहते हैं, तो करेले की उन्नत खेती को जरूर अपनाएं और अपने कृषि व्यवसाय को नई ऊंचाइयों तक ले जाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ - Bitter Gourd Farming)
Q1. करेले की खेती के लिए सबसे अच्छा समय कौन सा है?
उत्तर: करेले की खेती के लिए फरवरी–मार्च (गर्मी) और जून–जुलाई (मानसून) सबसे उपयुक्त समय होता है। तापमान 25°C से 32°C के बीच होने पर पौधों की वृद्धि अच्छी होती है।
Q2. करेले की खेती में कितना खर्च और मुनाफा होता है?
उत्तर: 1 एकड़ में लगभग ₹30,000–₹45,000 तक लागत आती है, जबकि सही तकनीक अपनाने पर ₹1.5 लाख से ₹3 लाख तक का मुनाफा कमाया जा सकता है।
Q3. करेले की खेती में मचान विधि क्यों जरूरी है?
उत्तर: मचान विधि से पौधों को सहारा मिलता है, जिससे फल जमीन से ऊपर रहते हैं, साफ और सीधे बनते हैं तथा उत्पादन 30%–40% तक बढ़ जाता है।
Q4. करेले की फसल कितने दिनों में तैयार होती है?
उत्तर: बुवाई के लगभग 50–60 दिन बाद फल तैयार होने लगते हैं और 2–3 दिन के अंतराल पर तुड़ाई की जा सकती है।
Q5. करेले में कौन-कौन से मुख्य कीट और रोग लगते हैं?
उत्तर: फल मक्खी, एफिड और थ्रिप्स मुख्य कीट हैं, जबकि पाउडरी मिल्ड्यू और वायरस रोग प्रमुख समस्याएं हैं। इनका समय पर नियंत्रण करना जरूरी है।
Q6. करेले की खेती के लिए कौन सी मिट्टी सबसे अच्छी होती है?
उत्तर: दोमट या बलुई दोमट मिट्टी, जिसमें जल निकासी अच्छी हो और pH 6.0–7.5 के बीच हो, करेले की खेती के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।
Q7. क्या करेले की खेती से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है?
उत्तर: जी हां, यदि किसान उन्नत किस्म, मचान विधि, ड्रिप सिंचाई और सही मार्केटिंग अपनाते हैं, तो वे करेले की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
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